Adrishya Shakti

कल रात ऑफिस से आने के बाद मेरा मन बिलकुल नहीं था बाहर जाने का, फिर भी पता नहीं क्यों की अंदर से ऐसा बार-बार महसूस हो रहा था की मुझे बाहर निकलना चाहिए। दोस्तों को कॉल किया और सबने रात 10:45 शोटाइम वाला स्पाइडरमैन मूवी जाना तय किया। स्पाइडरमैन सच में बहुत अच्छी मूवी थी। पर फिर भी ना जाने क्यों मुझे इंटरवेल के बाद से नींद सी आने लगी। जब मूवी ख़तम होने को आयी तो मेरी नींद टूटी। फिर घर जाते टाइम जिंदगी के दर्शन हो गए मुझे।

रायपुर में एक बहुत बड़े ज्वेलर्स का शोरूम है। कल रत में लौटते समय देखा की शोरूम के ठीक बगल में एक और शटर बंद दूकान थी जिसके सामने एक परिवार (बच्ची और उसके मम्मी पापा) बैठा हुआ था। मैं देखते हुए निकल गया, फिर लगा की ये सामान्य बात नहीं है। वापस गाड़ी मोड़ कर उस परिवार के पास जा बैठा। पूछा यहाँ क्या कर रहे हो। उसने बताया की लोग सुबह होते ही घर चले जायेंगे। ऑटो नहीं मिल रही है तो यहाँ सो रहे हैं। मैंने पूछा आखिर इतना लेट क्यों करते हो ऑटो निकल जाए ,साथ में बच्ची है आपके।।कुछ देर रुक कर ऑटो देखा मैंने पर रात को डेढ़ बजे कहाँ से ऑटो दिखे!! मैं उन्हें इस हाल में छोड़ कर जा नहीं पा रहा था। इसलिए कुछ देर तक उनसे बात करते रहा।

दरसल ये परिवार शाम 6 बजे से लेकर रात 12 बजे तक एक होटल में काम करता है। पत्नी बर्तन मांजती है और पति होटल में अन्य काम करता है। घर में बच्ची अकेली होती है तो उसे साथ ले आतें हैं,फ़िलहाल उसकी पढ़ाई का ठिकाना नहीं। लेकिन इनकी होटल से छुट्टी रात को 12 बजे होती है। इनका घर आउटर में है और उस वक़्त वहां से वापस जाने के लिए कोई भी ऑटो नहीं मिलता है। गलती से कोई ऑटो मिल जाता है तो वो प्राइवेट बुकिंग के नाम पर 250 से 300 रूपये मांगता है। जो इस परिवार के एक सदस्य की रोजी है। इसलिए ये लोग रोजाना इस शटर बंद दूकान के आगे पिछले एक महीने से इसी तरह सो जाया करते हैं। हम अपने घर में तमाम सुविधाओं के बाद शिकायत करते हैं , पर इस परिवार के लिए इस तरह की कठिनाइयां आम बात हैं।जिसे ये स्वीकार कर चुके हैं। जाते हुए उस महिला को 50 रूपये देकर मैं घर आ गया।

रस्ते में आते आते कई रिक्शे वालो और बहुत से लोगो को इसी तरह से सोते देखा तो मन खिन्न सा हो गया। घर जाते ही साथ पेटी में रखे दो कम्बल निकाले और वापस इस परिवार के पास लौट आया। आ कर देखा तो यह परिवार एक पतला सा कम्बल ओढ़े सोने की कोसिस में था। वह कम्बल तीनो एक साथ नहीं ओढ़ पा रहे थे।पर बच्ची को बीच में सुलाकर कोशिस थी की वह सुरक्षित रहे और बेहतर नींद ले। जाते ही साथ गाड़ी की आवाज से बच्ची की नींद खुली और सब जग गए। मैंने उन्हें वो दोनों कम्बल देकर आराम से सोने के लिए कहा। वह महिला हाथ जोड़ कर कहने लगी आप इतना परेशान मत हो जाओ भैया। हम लोग सुबह होते ही चले जायेंगे, आप घर चले जाइये। मैंने हामी भरी और वहां से निकल गया। उस परिवार में विनम्रता का भाव देख रहा था मैं।

अब नींद पूरी तरह से टूट चुकी थी,घर जा कर भी नहीं सो पाया। 15 लाख की आबादी वाले इस शहर में ऐसे कितने लोग अपनी राते यु बिताते होंगे? मैंने अपने बहुत से करीबियों को जानता हु,कई बड़े लोगो को देखा है। जो पूरी कोशिश में होते हैं की अपने कर्मचारी को कम से काम तनख्वाह दे सकें। दूकान से निकलने के बाद कोई नहीं पूछता की तुम सकुशल पहुंच जाओगे या नहीं। उनके भविष्य की और अन्य जिम्मेदारियों की कॉउंसलिंग करते नहीं देखा मैंने बहुतो को। नौकर उनके लिए नौकर है। ये नहीं तो कोई दूसरा आ जायेगा काम करने के लिए। इस बच्ची के भविष्य को सोच रहा था। देश में जो माहौल चल रहा है। उस हिसाब से अगर कभी कोई दिक्कत हो जाती है तो हम पढ़े लिखे लोग मोमबत्ती ले कर सड़को पर आ जायेंगे। पर यही लोग जब इस सड़क से गुजरते हैं तो इन परिवारों को देख कर मुँह मोड़ लेते हैं , गाडी के शीशे ऊपर कर लेते हैं। अपने बच्चो को यही सिखाते हैं की वो रिक्शे वाले के बच्चे के साथ मत खेलना , वो गंदे कपडे पहना है आदि आदि। पर ताउम्र आप यह कोशिश नहीं करते की उस रिक्शे वाले के बच्चे की ऊँगली पकड़ के उसे भी अपने बच्चे जैसा प्यार और मार्गदर्शन दें। जिस दिन आप यह सोच लेंगे न तो आने वाले भविष्य में ये दोनों बच्चे एक साथ आईआईएम क्रॉस करके निकलेंगे। पर आप ऐसा नहीं करते।

धर्म पूजन स्थलों के बाहर दिव्यांग , जरुरतमंदो की कतार बढ़ते ही देखि है। आप भीख देते हैं। पर आपका समूह उसे जिम्मेदार बनाने में यकीं नहीं रखता। लाखो करोडो कमाने वाला बड़े क्लब ज्वाइन करके चैरिटी करने में यकीं रखता है पर उसके संसथान के खुद के कर्मचारी उस्सकी प्रताड़ना से परेशान होते हैं। हर सरकारी विभाग के बड़े अधिकारी मंच पर खड़े हो मीठा भासन देते हैं लेकिन उसके अधीनस्थ उससे परेशान रहते, आत्महत्या तक कर लेते हैं। आखिर क्यों इन परिवारों को इस तरह राते काटने के लिए मजबूर होना पड़ता है। हम कहाँ जा रहे हैं,कौनसी संभ्यता को पुनर्जीवित करने में लगे हैं।।दोषी कौन है ,पक्ष/विपक्ष की सरकारें या हम खुद। यहाँ लोगो को जनसँख्या ही समझा जाता है इससे ज्यादा कुछ नहीं।


इस पोस्ट के ठीक विपरीत भी कुछ उदाहरण है जिनकी वजह से दुनिया में विश्वास कायम है ।।शायद वही एक सकरात्मक ऊर्जा हमें निरंतर आगे बढ़ने को ताकत और धैर्य प्रदान करती है। आप रायपुर में हैं तो मुझे इनबॉक्स कर सकते हैं।।अगर इस परिवार के लिए कुछ सही काम दे सकें तो मेहरबानी होगी। बच्ची की स्कूली शिक्षा की जिम्मेदारी लेने के लिए तैयार हैं हम ।इस परिवार से दुबारा मिलने जाऊंगा। कोशिश करता रहूँगा की उनकी रातें सुकून भरी हो। वह ठीक वैसा ही जी सकें जैसे आप और मैं जी रहे हैं।
बाद में एहसास हुआ की मुझे घूमने नहीं जाना था , एक अदृश्य शक्ति शायद मुझे इस परिवार तक पहुंचाने की हर संभव कोशिश कर रही थी। सच कहूं तो मेरे साथ जीवन में ऐसे बहुत से अजीब संयोग हुए हैं। जिसका परिणाम अच्छा ही रहा है।
रविन्द्र सिंह क्षत्री, सुमित फाउंडेशन "जीवनदीप" 07/7/2019

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